‘‘शिरगुल महाराज की जय’’ के उद्घोष से गूंजा शावगा, ब्रह्म महूरत में कुरूड़ की स्थापना

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पवन तोमर। राजगढ़
शिरगुल देवता के नव निर्मित मंदिर के प्रथम चरण के कार्य के पूरा हो जानेपर, मंदिर की अंतिम प्रक्रिया ‘‘कुरूड़’’ स्थापना का आयोजन किया गया जिसमें नौतबीन यानि शिरगुल महाराज के राज्य के सैंकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग ले कर उक्त परंपरा का निर्वहन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने ‘‘शिरगुल महाराज की जय’’ का उद्घोष किया तो शावगा क्षेत्र की वादियां आस्थामय उच्चारण से गूंज उठी।

कुरूड़ स्थापना के बाद, वैकल्पिक व्यवस्था में समय काट रहे शिरगुल महाराज को नये मंदिर में बने सिंहासन पर विधि-विधान के साथ विराजमान किया गया। अब देवता के दर्शन सभी श्रद्धालु कर पाएंगे। इस प्रथा के लगभग तीन घंटे बाद शिरगुल महाराज, पूरे गाजे-बाजे के साथ, तीर्थस्नान चूड़धार के लिए रवाना हो गए जिसे क्षेत्र में ‘‘जातर’’ के नाम से पुकारा जाता है। रविवार को लगभग तीन बजे सुबह, नौतबीन के सैंकड़ों श्रद्धालु शिरगुल मंदिर के प्रागंण में ऐकत्र होने आरंभ हो गए थे और लगभग चार बजे तक मंदिर प्रांगण भर चुका था। इसी दौरान, पहले से तैयार कुरूड़ को श्रद्धालुओं द्वारा हाथों हाथ उठा कर, देव वादन और शिरगुल के जयकारे के साथ लाया गया और मंदिर के शिखर पर स्थापित कर दिया गया। ज्ञात रहे कुरूड़, देवदार की लंबी शहतीरी होती है जो अंदर से खुरच कर बनाई होती है।

कुरूड़ स्थापित करने के बाद पंडित विद्यादत्त द्वारा विधि विधान के साथ कुरूड़ पूजन किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान, शिरगुल महाराज ने घणिता के माध्यम से नौतबीन को अपना आशीर्वाद भी प्रदान किया। तदोपरांत देवता को वैकल्पिक निवास से नव निर्मित मंदिर लाया गया जहां उन्हें विधिवत तरीके से अपने सिंहासन जिसे गंबरी कहते हैं, में विराजमान कर दिया गया। यह भी याद रहे कि इसी दिन यानि रविवार के दिन ही शिरगुल महाराज की जातर, को चूड़धार ले जाने का कार्यक्रम भी रखा गया था जिसका आयोजन देवकार्य प्रमुख अथवा ‘‘ठगड़ा’’ रणवीरसिंह द्वारा शिजस्वी समिति अध्यक्ष अमरसिंह के माध्यम से किया गया है। इस आयोजन के तहत लगभग एक बजे देवता की प्रतिमा को विशेष देवपात्र जिसे कौंडा कहते हैं, में घणिता यशवंत सिंह द्वारा बाहर लाया गया और देवयात्रा आरंभ कर दी गई। इसी संदर्भ में सैंकड़ों श्रद्धालु भी देवयात्रा में चल पड़े। इस दौरान देवपथ पर गौमूत्र के छींटे डाले गए जिसे शुद्धिकरण कहते हैं।

लगभग आधा किमी के बाद महिलाएं और चूड़धार न जाने वाले श्रद्धालु देवता को प्रणाम करके वापस आ गए और लगभग 100 श्रद्धालु देवता के साथ वादन और शिरगुल देवता का जयकारा करते हुए चूडध़्ार यात्रा पर चल पड़े। याद रहे ये श्रद्धालु, बांगा पाणी नामक स्थान पर रात्रि विश्राम करेंगे। ये वही पवित्र स्थान है जहां पर बिजट महाराज का जन्म हुआ था। बिजट महाराज शिरगुल की बड़ी मां के पुत्र थे और शिरगुल से छोटे थे। यहां पर जातरूओं की संख्या में बढ़ोतरी, हजारों में हो जाती है।

दूसरी सुबह ये वहां से लिंगेश्वर महाराज के दर्शन करते हुए दिन में चूड़धार पहुंच जाएंगे। वहां से देवस्नान करने के बाद वापस पिछला मोढ़ नामक स्थान पर रात गुजारेंगे। अगली सुबह यानि 25 जून को ये वापस शाया मंदिर पहुंचेंगे और देवता अपने सिंहासन पर विराजमान हो जाएंगे। इस दिन क्षेत्र के श्रद्धालु आ कर देवता का स्वागत करते हैं और शिरगुल महाराज घणिता के माध्यम से अपनी देववाणी में अपनी प्रजा को सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

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