पझौता की घाटी में हेरिटेज ने लोक गाथाओं के संवर्धन के लिए बढ़ाया कदम

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पवन तोमर। राजगढ़
यहां से 45 कि. मी. की दूरी पर स्थित द्राबला गांव के समीप घाटी में हेरिटेज संस्था के तत्वावधान में लोक गाथाओं के संवर्धन संरक्षण के लिए एक कार्यशाला का शुभारंभ जिला भाषा अधिकारी अनिल हारटा ने किया। हेरिटेज संस्था की अध्यक्षा अनुजा ठाकुर और महामंत्री गोपाल सिहं ने कहा कि इस कार्यशाला का आयोजन संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की स्वीकृत परियोजना के अन्तर्गत किया जा रहा है। विलुप्त हो रही लोक गाथाएं तथा इसकी गायन शैली और ताल वादन क्रम एवं इन लोक गाथाओं में अतीत का समृद्व सार्थक व भावपूर्ण लोक साहित्य जो आज तक श्रुति व स्मृति से आज तक विरासत में स्थापित हुआ था वह विलुप्त होने की कगार पर पड़ा है।

गोपाल सिंह ने बताया कि इसे संवर्धन हेतु तथा परियोजना के कार्यन्वयन के लिए क्षेत्र के लोक संगीत और लोक कलाओं से जुुड़े बजुर्ग कलाकारों की एक समिति का गठन विद्यानन्द सरैक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कलाकार तथा हिमाचल भाषा कला एवं संस्कृति अकादेमी के सदस्य की अध्यक्षता में किया गया है। कमेटी ने सर्वेक्षण के पश्चात् एक रिपोर्ट तैयार की जिसे कुछ दिन पूर्व क्षेत्र के जाने माने विद्वानों की शोध गोष्ठी के बाद हेरिटेज को प्रदान किया है। इस रिपोर्ट में गिरि पार क्षेत्र विभिन्न आंचलों के युवा कलाकारों को कार्यशाला में निमंत्रण देने के निर्देश भी दिए गए परिणाम स्वरूप गाथा गीतों के संरक्षण और संवर्धन के लिए हार, बार, साका, प्वाड़ा, पांजड़े जिसमें शिरगुल देवी रूद्र आदि के देव गाथा गीत तथा भारथो, पंडवायण, रामायण को भी परियोजना कार्यन्वयन के लिए कार्यशाला की विषय सूचि में कलाकारों को प्रशिक्षण हेतु रखा गया है। कार्यशाला का शुभारंभ हारूल के लोक ताल विधाओं के साथ मुख्य अतिथि के सम्मान व दीप प्रज्वलन के बाद प्रारम्भ हुआ। गोपाल ने बताया कि इस कार्यशाला में सिरमौर के शिलाई तथा सिरमौर की सीमा से जुड़े कुपवी क्षेत्र के युवा कलाकारों एवं रासूमानदर पुलवाहल के लोक कलाकारों ने इस कार्यशाला में उपस्थिति दर्ज की।

इस कार्यशाला में अध्ययन के साथ साथ प्रशिक्षण व अनेको स्थानों पर मंचन भी करवाए जाएंेगे। इस अवसर पर जिला भाषा अध्किारी अनिल हारटा ने हेरिटेज संस्था के आयोजकों को बधाई देते कहा कि लोक गाथाएं हमारी लोक संस्कृति का विशिष्ट और मूल लोक साहित्य है जो अनादिकालीन सांस्कृतिक विरासत की अभिव्यक्ति है। ये हार, बारें, साके, प्वाड़े, पाजड़े असंख्य लोक गाथाएं आदिकालीन संस्कृति को काव्यात्मक छन्दोयुक्त अलंकारिक पहलुओं से संवारे है और लय ताल की मनमोहक अभिव्यंजना का रूप है। इन लोक गाथाओं को श्रुति और स्मृति से इन गरीब कलाकारों ने विरासत में आज तक पहुचाया है जो आज विलुप्त होने की कगार में है। इसके पीछे पाश्चात्य सभ्यता का कुप्रभाव और रूपहले पर्दे के दुष्परिणाम है। जिला भाषा अधिकारी अनिल हारटा ने कहा मुझे आशा है कि यह कार्यशाला युवा प्रशिक्षुओं को अभ्यास के साथ-साथ सही रास्ते की और ले जाएगी वहीं सरैक जैसे लोक संस्कृति के पुरोधा के सहयोगियों सहित इन लोक गाथाओं की हर विधाओं का संरक्षण संवर्धन होगा। इस कार्यशाला में आकर मुझे यह महसूस हुआ है कि पूरे सिरमौर जनपद की मौलिक विधाओं का संरक्षण संवधर््ान होगा। मैं हेरिटेज संस्था का आभारी हूं कि इस पुनित पर्व पर मुझे भी उपस्थित होने का मौका मिला है। मैं हेरिटेज संस्था को इस आयोजन हेतु बधाई व शुभकामनाएं देता हंू। कार्यशाला में 22 कलाकार और 2 विशेषज्ञ व 6 वादक कलाकार भाग ले रहे हैं।

मुख्य अतिथि विशेषज्ञ एवं कलाकारों का स्वागत संस्था की अध्यक्षा अनुजा ठाकुर ने किया। इस अवसर पर सरैक ने सर्वेक्षण शोध गोष्ठी तथा कार्यशाला में प्रशिक्षण देने की व्यवस्था पर प्रकाश डाला विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों तथा पझौता क्षेत्र के युवा प्रशिक्षुओं ने लोक नृत्य की प्रस्तुति मुख्य अतिथि के सम्मान में दी।

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