हिमालयन नेशनल पार्क ग्रेट, लेकिन पर्यटन के क्षेत्र में लेट, जानिये क्या है इसकी खासियत

बीके शर्मा। कुल्लू
ज़िला कुल्लू के बंजार से लेकर सैंज, मणिकर्ण घाटी तक फैला हुआ ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क दुनिया भर में ग्रेट तो हो गया है। लेकिन पर्यटन के क्षेत्र में अभी भी पार्क काफी लेट है। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद भी यह पार्क पर्यटकों को अपनी ओर पूरी तरह से आकर्षित नहीं कर पाया है। इसके लिए अभी कोई खास योजना भी नहीं बनाई गई है। विश्व धरोहर बनने के बाद न तो प्रदेश सरकार ने और न ही विभाग ने इस पार्क में पर्यटन के पंख लगाए हैं। अगर सही मायने में विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क को पर्यटन की दृष्टि से उभारा जाए तो वह दिन दूर नहीं जब देश भर के लाखों पर्यटक यहां पहुंचने शुरू होंगे।

      गौर रहे कि जून 2013 में कंबोडिया में हुई यूनेस्को की बैठक में इस पार्क को विश्व धरोहर का दर्जा मिलना था। लेकिन यूनेस्को की टीम की रूचि होने के बावजूद इस पार्क को विश्व धरोहर का दर्जा नहीं मिल पाया था। इस बैठक में कई खामियां निकाली गई थी जिस कारण इस पार्क को विश्व धरोहर का दर्जा नहीं मिल पाया। जबकि अरब देश के दोहा में 2014 में होने वाली यूनेस्को की बैठक में यह सपना पूरा हुआ था। इसके लिए पार्क प्रबंधन को अथक प्रयास करना पड़ा था। प्रबंधन को जहां 2 अन्य सैंक्च्यूरियों को भी इसमें शामिल करना पड़ा था वहीं, मैनेजमेंट काउंसिल का भी गठन किया गया था। इस काउंसिल में 13 पंचायतों के प्रधानों को सदस्य बनाया गया है और रेंज ऑफिसर भी सदस्य थेे। डीएफओ सदस्य सचिव व निदेशक बीएस राणा इसके चेयरमेन थे।

      इस काउंसिल में निश्चित किया गया है कि यहां की सभी प्रभावित पंचायतों को विश्व धरोहर बनने पर लाभ व रोजगार मिले। इस पार्क को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि कुल्लू ही नहीं पूरे प्रदेश का पर्यटन की दृष्टि से इतिहास ही बदल जाएगा। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में जहां कुदरत का अनमोल खजाना है। वहीं इसके साथ लगती तीर्थन घाटी व तीर्थन नदी के पर्यटन को भी पंख लगेगें। हलांकि आज तक यह घाटी सरकारी उपेक्षा की शिकार है।

       पार्क में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की जड़ी बुटियों की महता को मद्देनजर रखते हुए ही इसे विश्व धरोहर का दर्जा मिला था। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में जीवन रक्षक जड़ी बुटियों का खजाना मौजूद है। जहां कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी के इलाज से लेकर नपुसंकता तक के उपचार की महत्वपूर्ण जड़ी बुटियां हैं। जिनकी विश्व भर में वैज्ञानिकों को बहुत आवश्यकता हैं। इस पार्क में 31 प्रकार के स्तनधारी जानवर, एक हजार से अधिक वनस्पति तथा 180 से भी ज्यादा किस्म के दुर्लभ पक्षी व अनेक प्रकार की सुंदर तितलियां पाई गई हैं। नेशनल पार्क समेत जिला के जंगलों में वन कक्कड़ी व रखाल दो ऐसी जड़ी बुटियां पाई जाती है। जिनका उपयोग कैंसर के उपचार के लिए होता है। वहीं, हथपंजा नाम की जड़ी बूटी पाई जाती है जिस का प्रयोग नपुसंकता व अतिसार पेचिस के इलाज में किया जाता है।


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       आर्किडेसी वर्ग की यह वनस्पति तोस,रई व खरसू के वन की घास में तथा जोतों,ऊंचे बर्फिले पहाड़ों की छोटी-छोटी जलधाराओं के किनारों पर पाई जाती है। जबकि मुश्कबाला नहणू की जड़ों का तेल हिस्टीरिया रोग के उपचार में बहुत लाभदायक है। विभिन्न प्रकार की जंगली जड़ी बुटियों से भरे कुल्लू जिला के वनों में वायोलेसी प्रजाति की वनक्शा बूटी पाई जाती है। रेननकुलेसी वर्ग की पतीश नामक औषधीय बूटी सांस के रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। पतीश को संस्कृत में अतिविशा कहा जाता है। कड़ू की जड़ें हलांकि अनेक रोगों के उपचार में काम आती है लेकिन अधिकतर कड़ू की जडें़ सूजन, पेट रोग, ज्वर व कास रोग के उपचार हेतु प्रयोग की जाती है।

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ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास होने चाहिए। यदि यह प्रयास सफल हुए तो यह प्रदेश का बहुत बड़ा पर्यटन हब बनेगा। -दौलत भारती,बुद्धिजीवी बंजार

अगर प्रदेश में भाजपा की सरकार आई तो निश्चित तौर पर इस पर काम किया जाएगा। पर्यटन की दृष्टि से ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क पर काम किया जाएगा। -सुरेंद्र शौरी, भाजपा नेता।

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