तो ऐसे में मिट जाएगी हस्त शिल्प कारोबारियों की हस्ती, खतरे में पुरखों का कारोबार

बीके शर्मा। कुल्लू
दस्तकारी व्यवसाय पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। दशहरा उत्सव को समाप्त हुये अब तक करीब एक माह का समय हो चुका है लेकिन उनके उत्पादों की अभी तक खरीददारी नहीं हो पाई है। जबकि प्लास्टिक के बने उत्पाद भी उनके सामान पर भारी पड़े हुए हैं। कुल्लू और मंडी के हजारों परिवार इस व्यवसाय से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुये हैं। धरातल की सच्चाई यह है कि अब स्वयं दस्तकार भी इस व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसाय अपनाना चाहते है। ताकि कुनबे की रोजी-रोटी का तोड़ ढूंढा जा सके।

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    दस्तकारियों की कहानी उन्हीं की जुबानी कहें तो प्लास्टिक के सामान पर सरकार को प्रतिबंध लगाना चाहिए। क्योंकि आबोहवा के लिये प्लास्टिक ऐसे भी खतरनाक है। ऐसे में जहां उनके सामान का भी सरंक्षण हो जाएगा, वहीं प्रदूषण से भी निजात मिल जाएगा। यदि इसमें नजरअंदाजी की गई तो करीब एक दशक बाद उनके व्यवसाय का वजूद खत्म हो जाएगा। तीन सप्ताह तक दशहरा उत्सव में अपने उत्पादों को बेचने आये कारोबारियों के उत्पादों को खरीदना तो दूर की बात रही। कोई भी इनके उत्पादों को देखना भी पसंद नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि प्लास्टिक के उत्पादों की हाथों हाथ बिक्री हो रही है।

      कुल्लू में 1 दर्जन के करीब कारोबारी अपने उत्पादों को बेचने आये हैं। इनमें कुल्लू व मंडी के हस्तशिल्पकार शामिल हैं। उन्हें मलाल है कि सरकार का नकारात्मक रुख भी उनके व्यवसाय को चैपट करने पर तुला हुआ है। इनका संरक्षण भी नहीं हो रहा है और न ही उन्हें सरकार की ओर से कोई आर्थिक सहायता भी नहीं मिल पा रही है। लकड़ी और लोह के बने औजारों की खरीद-फरोख्त नहीं हो रही है। इनमें किल्टे से लेकर टोकरियां, शांच, हल, जूं, शूप, भोइलू आदि हैं जबकि लोहे के बने औजार भी ग्राहकों की बाट जोह रहे हैं।

खतरे में पुरखों का कारोबार
विश्वकर्मा वैल्फेयर सोसायटी अध्यक्ष ओत राम ने बताया कि कुल्लू दशहरा में हस्तशिल्पकारों के उत्थान के लिए लाल चंद कला प्रार्थी केन्द्र में डीसी के द्वारा प्रतियोगिता करवाई गई। प्रशासन की ओर से हस्तशिल्पकारों के लिए कदम उठाये जा रहे। उन्होंने बताया कि पुरखों का यह व्यवसाय भी खतरे में पड़ गया है। युवा भीं रुचि न होने के कारण वे अपने पुरखों के व्यवसाय में भी हाथ बंटाना नहीं चाहती।

     दोहरानाला के हरफे राम, लुदरमणि व दुनी चंद का कहना है कि उनका 70 फीसदी कारोबार खत्म हो गया है। इनका कहना है कि लकड़ी के उत्पादों को बनाने के लिए उन्हें काफी दूर से बांस की लकड़ियों को इक्ट्ठा करना पड़ता है। किल्टें के लिए तो छोटी बांस उपयोग में लाई जाती है। इसमें काफी धन और समय लग जाता है। जबकि लकड़ियों के बाद इसका निर्माण करने में घर के अन्य सदस्यों को भी लगाना पड़ता है। युवा पीढ़ी से इससे दूर भाग रही है। उनकी कोई भी रुचि नहीं है। इससे एक ओर जहां उनका कृषि और बागवानी कार्य चैपट हो जाता है, वहीं मुनाफे की आस में उनके उत्पाद भी नहीं बिक पा रहे हैं।

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