देवभूमि में यहां नहीं करवाचौथ का महत्व

न्यूजघाट टीम। किन्नौर
हिमाचल प्रदेश के दूर दराज और जनजातीय क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां करवाचौथ मनाना तो दूर करवाचौथ के मायने क्या हैं, कई महिलाएं जानती तक नहीं। खासकर बौद्ध धर्म बहुल क्षेत्र में गांव में कोई भी महिला हो या नई नवेली दुल्हन करवाचौथ से कोई लेना देना नहीं है। इतना जरूर है की जो लोग अपने गांव छोड़ शहरांे में बसे हंै या फिर नौकरी पेशे से जुड़े होने के कारण बाहर हैं। वे अवश्य इस त्यौहार में शामिल हो रहे हैं। किन्नौर के अलावा दूसरे जिलों के दूर दराज में भी स्थिति कामोवेश ऐसी ही रही। वे दिन भर अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रही। किन्नौर के खास कर अप्पर किन्नौर में इस का बिलकुल भी रिवाज नहीं है। उनका तर्क है कि इस तरह का प्रचलन पहले से हैं नहीं, तो रिवाज में नई परम्परा को क्यों जोड़ा जाए।

     आज कई गांव ऐसे हैं, जहां एक भी घर में करवाचौथ त्यौहार नहीं मनाया गया। महिलाएं आम दिनों की तरह काम-काज में सुबह से शाम तक मस्त रही। किन्नौर जिला के तिब्बत सीमा के साथ आखिरी गांव नामग्या की यांग्चेन डोलमा हालांकि वह अब शहर में रह रही हैं। लेकिन वे इस परम्परा से दूरी बनाए हंै। वे कहती हैं कि बौद्ध धर्म के अनुसार जो परम्परा है। उसी का वे और उन का परिवार अनुसरण कर रहा है। नामग्या गांव की ही छेरिंग पालजोम, ताशी डोलमा व शेरामा ने बताया आज दिन भर नामग्या में अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रह। उन्हें यह त्यौहार क्या है, इससे लेना देना नहीं था। वे तो अपने दिनचार्य में मस्त हैं।

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     किन्नौर के खाब गाव की कृष्णा, छोगे लामो, नाको की कुंजमा, व पूह उपमंडल मुख्यालय की होसलमा, गुलाबी, मदो लामा और सोनम ने बताया की जो महिलाएं एवं युवतियां क्षेत्र से बाहर हैं। उन में से सम्भवतः अधिकतर इस उत्सव को मना रही हांेगी। लेकिन गांव में करवाचौथ का कोई प्रचलन नहीं है। किन्नौर के नेसंग गांव के रहने वाले पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी आरएस नेगी का कहना है करवाचौथ किन्नौर के रीतिरिवाज में नहीं है। इसलिए गांव में लोग इसे ध्यान नहीं देते। उन्होंने कहा शहरीकरण के कारण कस्बाई इलाकों में इस त्यौहार को महिलाएं अब धीरे-धीरे मनाने लगी हंै।

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