देवभूमि में भांग उन्मूलन अभियान से कहीं पूरी तरह विलुप्त हो जाए यह औषधील पौधा

वीएस पाठक। शिमला
प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पिछले काफी समय से भांग उन्मूलन के प्रखर अभियान चलाए जा रहे हैं। इससे प्रदेश में यह औषधीय पौधा कुछ दिनों में विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है। अभी हाल ही में हुई रिसर्च से पता चला है कि इस पौधे के औषधीय गुण इसकी नशे वाली प्रवृति से कहीं ज्यादा है।

      आईजीएमसी में मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञ का कहना है कि 1893 में इंडो ब्रिटिश ने हैंप ड्रग कमीशन बनाकर इस पौधे का औषधीय मूल्यांकन किया था। इस अध्ययन में यह साफ हो गया था कि इसके सेवन से कोई गंभीर स्वास्थ्य की क्षति नहीं होती। 1980 से अमेरिका के लगातार बढ़ते दबाव के कारण भारत में 1985 में भारत सरकार ने एनडीपीसी एक्ट में कैनाबिस इंडिका, जिसे मैरीजुआना भी कहा जाता है, इसे प्रतिबंधित कर दिया।

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     एक अध्ययन में जादुई पौधे कहे जाने वाले इस पौधे के औषधीय गुणों पर विस्तार से अध्ययन किया गया है। इसकी लिवर संबधी रोगों के निदान में महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रदेश में इस अंग के खराब होने के मामले में भी तेजी आई है। कुल्लु आदि जनजातीय क्षेत्रों में तो न केवल वहां के निवासियों की आर्थिकी में सहायक रहता था, बल्कि इसके साथ ही वहां की कठिन परिस्थितियों में इसकी आवश्यकता बनी रहती थी। इस पौधे की औषधीय उपयोगिता पर आयुर्वेद में काफी शोध किया गया है। इसके सेवन से अनिद्रा, अपच और पाचन संबंधी रोगों के निदान में बेहद सहायता पहुंचती है।

     मेडिकल सांईस में इसकी उपयोगिता के ऊपर हुए अनुसंधानों को लगभग नजर अंदाज किया गया, जिसका नतीजा यह रहा कि लोगों को इसकी खेती के लाईसेंस प्रदान करने के बजाय सख्ती से भांग की खेती को नष्ट करने को ही प्राथमिकता दी गई।

सांस्कृतिक महत्व भी है भांग का
प्रदेश के विभिन्न मंदिरों में शिव पूजा का अपना विशेष महत्व आदिकाल से रहा है। कई देवी-देवता शिव के अपभ्रंश नाम के रूप में ही देखे जाते हैं, जिस कारण उनकों पूजा के समय भांग अर्पित की जाती रही है। यह प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में सर्वमान्य है कि शिवरात्री के अवसर पर लोग भांग का घोटा और पतियां व भांग की डालियां भगवान शिव को अर्पित करते हैं। भांग उन्मूलन के अभियानों ने लोगों की स्थापित मान्यताओं को भी तार-तार कर दिया है।

भांग से शराब की ओर हो रही प्रवृति
भांग के विकल्प के रूप में लोग अब शराब की ओर आकर्षित हुए हैं, जोकि आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इस पर सरकार की कोई पाबंदी न होने के कारण यह प्रदेश के हर हिस्से में बड़ी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसके सेवन से लिवर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में लीवर के रोगियों की तादात में अच्छी खासी वृद्धि देखने को मिल रही है। इस अस्पताल में प्रतिदिन कोई न कोई लीवर के क्षतिग्रस्त होने का केस आ रहा है। इतना ही नहीं शराब के सेवन से हर रोज सड़क हादसों में भी वृद्धि हो रही है।

बुर्जगों को नहीं रास आ रहा भांग उन्मूलन अभियान
प्रदेश के बडे़ बूढ़ों को भांग उन्मूलन के प्रशासनिक अभियान ज्यादा रास नहीं आ रहे। वे युवाओं की नशे की ओर बढ़ते कारण इन अभियानों पर तो सहमति जताते हैं, लेकिन इस पौधे के औधषीय गुणों के कारण यह इसके समूल विनाश के विरोध में है। उनका कहना है कि जब छोटे बच्चों में अपच, भूख न लगना और सर्दी जुकाम जैसे छोटे रोग हो जाते हैं, तो इसका बहुत कम अनुपात में गांव के वैद्यों के अनुसार उपयोग रोगों का खात्मा करने में सहायक रहता है। यही कारण है कि पुराने लोग भांग को औषधी के कारण सुरक्षित भी रखते थे।

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