रेशम की डोरी का पतंग की डोरी से नाहन में होता है अनोखा मिलन, इतिहास जानने के लिए पढे़

‘‘बोलो बे छोकरो काटे ओये‘‘ के जुमलों से गूंजा ऐतिहासिक शहर नाहन
न्यूजघाट टीम। नाहन
उत्तर भारत में ऐतिहासिक शहर नाहन में रक्षा बंधन का पर्व एक अनूठे तरीके से मनाया जाता है। एक ओर जहां देशभर में रक्षा बंधन पर केवल राखी बंधवा कर भाई अपनी बहनों को रक्षा का वचन देकर इस तैयार को मना रहे हैं। वहीं नाहन रक्षा बंधन पर रेशम की डोरी के साथ पतंग की डोरी भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते में अपना विशेष स्थान रखती है। दरअसल इस ऐतिहासिक शहर में रक्षा बंधन के साथ आसमान में पतंग उड़ाने की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है, जोकि आज भी जारी है। हालांकि समय के साथ-साथ पतंगबाजी में कुछ कमी जरूर आई हैं, लेकिन परंपरा आज भी कायम है। बरसों के चलते आ रहे भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में यहां पतंग की डोरी ने भी अपनी पक्की जगह बना ली है। नाहन में रक्षा बंधन के दिन पहले भाईयों ने अपनी बहनों से राखी बंधवाई और बाद में घर की छत्तों पर जाकर पतंग उड़ाने शुरू किए। इस बीच बहनें भी अपने भाई के साथ सहयोग देने छत्तों पर नजर आई।

क्या कहते हैं हमारे बुजुर्ग ?
बुजुर्गों का कहना है कि वह बचपन से जवानी तक रक्षाबंधन पर पतंगबाजी कर चुके हैं। इससे पूर्व उनके दादा पड़दादा भी पतंगबाजी करते आए हैं। बुजुर्गों की मानें तो पिछले चार दशकों की तुलना में अब पतंगबाजी दो तीन माह की तुलना में रक्षाबंधन के दिन तक सिमट कर रह गई है। पहले पतंगबाजी रक्षाबंधन से दो माह पहले ही शुरू हो जाती थी। युवक बाजारी डोर की अपेक्षा मांजे से सूती हुई डोर प्रयोग करते थे। अब आधुनिकता के दौर में पतंगबाजी का ट्रेंड भी बदला है।

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आपसी भाईचारे की भी होती है मिसाल कायम
रक्षाबंधन के दिन पतंगबाजी के दौरान आपसी भाईचारे की भी मिसालें देखने को मिली है। हिंदू-मुस्लिम, सिख लोगों ने भी रक्षा बंधन के अवसर पर पतंगबाजी में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

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रियासतकाल से चली आ रही है परंपरा
शहर में रियासतकाल से ही पतंगबाजी की परंपरा चली आ रही है। सिरमौर जिला जब एक रियासत थी, उस समय सिरमौर रियासत के राजा भी रक्षा बंधन पर पतंगबाजी करते थे। यही नहीं रियासत के दौरान पतंगबाजी की प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती थी।


बोलो बे छोकरो काटे ओये से गूंजा नाहन
पतंगबाजी के दौरान जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की पतंग को काटता, तो इस दौरान बोलो बे छोकरो काटे ओये के जुमले गूंज रहे थे। यह जुमला पतंगबाजी की परंपरा की तरह बेहद पुराना है, जोकि आज भी कायम है।


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